5 Simple Techniques For hanuman chalisa

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अर्थ - आप श्री राम चरित सुनने मे आनन्द रस लेते हैं। श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय मे बसे रहते हैं।

महावीर विक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥

अर्थ - जो भी आपकी शरण में आते हैं, उन सभी को आनन्द प्राप्त होता हैं, और जब आप रक्षक हैं, तो फिर किसी का डर नहीं रहता।

In your palms, you maintain a mace and a flag, as well as a sacred thread adorns your shoulder. you happen to be an incarnation of Lord Shiva and Kesari’s son. Your could possibly and glory are revered by your entire earth.

आप सुखनिधान हैं तथा सभी सुख आपकी कृपा से सुलभ हैं। यहाँ सभी सुख का तात्पर्य आत्यन्तिक सुख तथा परम सुख से है। परमात्म प्रभु की शरण में जाने पर सदैव के लिये दुःखों से छुटकारा मिल जाता है तथा शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है।

[Maha=good;Beera=courageous; Vikram=good deeds; bajra=diamond; ang=system pieces; kumati=lousy intellect; nivara=get rid of, cleanse, demolish; sumati=very good intelligence; ke=of; sangi=companion ]

जय जय जय हनुमान गोसाई। कृपा करहु गुरुदेव की नाई॥

व्याख्या – प्राणिमात्र के लिये तेज की उपासना सर्वोत्कृष्ट है। तेज से ही जीवन है। अन्तकाल में देहाकाश से तेज ही निकलकर महाकाश में विलीन हो जाता है।

भावार्थ – आप सारी विद्याओं से सम्पन्न, गुणवान् और अत्यन्त चतुर हैं। आप भगवान् श्री राम का कार्य (संसार के कल्याण का कार्य) पूर्ण करनेके लिये तत्पर (उत्सुक) रहते हैं।

The Hanuman Chalisa is much more than just a holy hymn; It's a strong Device for personal expansion and here spiritual enlightenment. Each verse carries a deep, insightful information that resonates With all the devotees, enabling them to imbibe Hanuman’s virtues into their own individual lives.

व्याख्या – रोग के नाश के लिये बहुत से साधन एवं औषधियाँ हैं। यहाँ रोग का मुख्य तात्पर्य भवरोग से तथा पीड़ा का तीनों तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक) से है जिसका शमन श्री हनुमान जी के स्मरण मात्र से होता है। श्री हनुमान जी के स्मरण से निरोगता तथा निर्द्वन्द्वता प्राप्त होती है।

अष्ट सिद्धि नवनिधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥

भावार्थ – भगवान् श्री राघवेन्द्र ने आपकी बड़ी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि तुम भाई भरत के समान ही मेरे प्रिय हो ।

तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ ह्रदय महँ डेरा॥

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